निशिकांत दुबे के बयान पर फूटा पप्पू यादव का गुस्सा: ‘पाकिस्तानी गद्दारों की औलाद की भाषा बोल रहे हैं
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**‘पाकिस्तानी गद्दारों की औलाद की भाषा बोल रहे हैं’ – निशिकांत दुबे के बयान पर भड़के पप्पू यादव, संसद सदस्यता रद्द करने की उठाई मांग**
बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे के एक विवादित सोशल मीडिया पोस्ट ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। इस पोस्ट में उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की विदेश नीति पर सवाल उठाए, जिसे लेकर कांग्रेस नेता पप्पू यादव भड़क उठे। उन्होंने दुबे के बयान को ‘देश विरोधी’ बताया और संसद से उनकी सदस्यता रद्द करने की मांग की है।
**मुख्य खबर:**
बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने हाल ही में एक पोस्ट कर देश की पूर्व प्रधानमंत्रियों की नीतियों को कठघरे में खड़ा कर दिया। अपने पोस्ट में उन्होंने लिखा –
*"मां इंदिरा जी ने भारत का द्वीप श्रीलंका को दान में दे दिया, बेटे राजीव जी ने लंका में आग लगाकर संबंध ख़राब कर दिए। नेपाल ने सोनिया जी को सम्मान नहीं दिया तो नेपाल को अनाज तक के लिए मोहताज कर दिया, जिससे चीन को नेपाल में घुसने का मौका मिल गया।"*
इसके अलावा उन्होंने म्यांमार का जिक्र करते हुए लिखा कि 1987 का दौरा प्रजातंत्र के लिए घातक साबित हुआ और म्यांमार के लोग भारत आ गए, जिससे आज भी उत्तर पूर्व के राज्य कराह रहे हैं।
निशिकांत दुबे के इस बयान पर कांग्रेस नेता पप्पू यादव ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने अपने पोस्ट में लिखा –
*"इससे बड़ा गद्दार कौन? यह पाकिस्तानी गद्दारों की औलाद की भाषा बोल रहा है- भारत ने श्रीलंका में आग लगाया था! क्या भारत सरकार इसकी बात से सहमत है? अगर नहीं तो संसद सदस्यता रद्द कर इसे अरेस्ट कर जेल में डाले भारत सरकार। देश के दूरदर्शी पीएम राजीव जी को कलंकित करने वाले का मुंह काला करेंगे।"*
पप्पू यादव ने सवाल उठाया कि क्या केंद्र सरकार इस बयान से सहमत है? यदि नहीं, तो सरकार को स्पष्ट रूप से इसकी निंदा करनी चाहिए और निशिकांत दुबे के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए।
**राजनीतिक विश्लेषण:**
निशिकांत दुबे के इस बयान ने एक नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है। एक ओर जहां बीजेपी खेमे में इस मुद्दे पर चुप्पी है, वहीं कांग्रेस और विपक्षी नेता इस बयान को देश के गौरवशाली अतीत पर हमला बता रहे हैं। पप्पू यादव का आक्रोश इस बात की ओर इशारा करता है कि यह मुद्दा केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आगामी सत्रों में संसद में भी इसकी गूंज सुनाई दे सकती है।
**निष्कर्ष:**
राजनीति में मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन जब देश के पूर्व प्रधानमंत्रियों को लेकर इस तरह के बयान सामने आते हैं, तो सवाल उठना लाज़मी है कि क्या सियासत में मर्यादा और गरिमा का कोई स्थान बचा है? क्या ऐसे बयान जनता के मुद्दों से ध्यान भटकाने का माध्यम बनते जा रहे हैं? अब सबकी निगाहें इस बात पर हैं कि केंद्र सरकार और बीजेपी इस बयान पर क्या रुख अपनाती है।
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