बिहार चुनाव 2025: दीघा सीट पर एनडीए में ही घमासान, बीजेपी बनाम जेडीयू!
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### **बिहार चुनाव 2025: पटना की दीघा सीट पर एनडीए के भीतर ही मची खींचतान, बीजेपी या जेडीयू – किसका पलड़ा भारी?**
पटना: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की तैयारियों ने अब रफ्तार पकड़ ली है। सियासी पार्टियों ने जहां अपने पुराने गढ़ों को बचाने की जद्दोजहद शुरू कर दी है, वहीं नए समीकरण भी उभरकर सामने आ रहे हैं। पटना जिले की सबसे अहम मानी जाने वाली **दीघा विधानसभा सीट** पर इस बार मुकाबला दिलचस्प होता नजर आ रहा है – और वह भी एनडीए के भीतर ही।
#### **दीघा: पटना का सबसे बड़ा विधानसभा क्षेत्र**
2008 में परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई दीघा सीट, वर्तमान में पटना की सबसे बड़ी विधानसभा सीट मानी जाती है। यहां **4 लाख 85 हजार से अधिक मतदाता** हैं, जिनमें महिला वोटरों की भागीदारी उल्लेखनीय रूप से सक्रिय रहती है। जातीय समीकरणों की बात करें तो यादव, राजपूत, भूमिहार, ब्राह्मण, कोइरी, कुर्मी, कायस्थ और वैश्य समुदायों के साथ-साथ लगभग **25 हजार मुस्लिम वोटर** भी चुनावी दिशा तय करने की ताकत रखते हैं। लेकिन इस क्षेत्र की एक और अहम विशेषता है – **अति पिछड़ा वर्ग का दबदबा**, जो हर चुनाव में निर्णायक साबित होता आया है।
#### **संजीव चौरसिया बनाम अपने ही गठबंधन के नेता**
वर्तमान में दीघा सीट से बीजेपी के **संजीव चौरसिया** विधायक हैं, जिन्होंने 2015 और 2020—दोनों चुनावों में जीत दर्ज की थी। 2015 में उन्होंने जेडीयू के राजीव रंजन को हराया था, जबकि 2020 में वामपंथी दल सीपीआईएमएल के प्रत्याशी को तकरीबन **49 हजार वोटों से मात** दी।
संजीव चौरसिया का दावा है कि उन्होंने क्षेत्र में अभूतपूर्व विकास कार्य किए हैं – जिनमें **1024 एकड़ भूमि विवाद का समाधान**, **181 करोड़ और 105 करोड़ की लागत से दो बड़ी फोरलेन सड़क परियोजनाएं**, और **नालों की सफाई व ढलाई** शामिल हैं। चौरसिया का साफ कहना है – "यह सीट बीजेपी की है, और रहेगी।"
लेकिन बीजेपी की इस बढ़त को चुनौती दे रहे हैं **जेडीयू के नेता बिट्टू सिंह**, जो इस सीट को अपनी पार्टी की "परंपरागत सीट" बता रहे हैं। उनका कहना है कि जब 2010 में यह सीट बनी थी, तब इसे जेडीयू के खाते में दिया गया था। उनका दावा है कि मुख्यमंत्री **नीतीश कुमार के काम** और जेडीयू की नीतियों के आधार पर वे यहां से चुनाव लड़ना चाहते हैं।
#### **एनडीए में खींचतान, विपक्ष की निगाहें**
हालांकि एनडीए के दोनों घटक दल—बीजेपी और जेडीयू—बाहरी तौर पर एकजुटता का संदेश दे रहे हैं, लेकिन **टिकट को लेकर अंदरखाने रस्साकशी** शुरू हो चुकी है। यही खींचतान अगर लंबी चली, तो इसका सीधा फायदा विपक्ष को मिल सकता है।
महागठबंधन की ओर से इस सीट पर फिलहाल कोई स्पष्ट चेहरा सामने नहीं आया है, लेकिन सीपीआईएमएल, राजद और कांग्रेस यहां मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने की रणनीति में जुटे हैं।
#### **क्या तीसरी बार भी होगी बीजेपी की वापसी?**
अब सवाल यह है कि **क्या संजीव चौरसिया को तीसरी बार भी जनता का साथ मिलेगा?** या फिर जेडीयू अपनी पुरानी सीट वापस लेने में सफल होगी? यह भी देखना होगा कि गठबंधन की राजनीति किस ओर रुख करती है – क्योंकि **टिकट का फैसला अंततः केंद्रीय नेतृत्व के हाथ में** होता है।
दीघा सीट का भविष्य फिलहाल अनिश्चितताओं से घिरा है, लेकिन एक बात तय है – यहां की लड़ाई सिर्फ विकास बनाम दावे की नहीं, बल्कि **गठबंधन के भीतर नेतृत्व की ताकत की भी परीक्षा** है।
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