फुले’ से फूंकते सियासी शंखनाद: बिहार में Rahul Gandhi का दलित-पिछड़ा कार्ड
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**ऑपरेशन सिंदूर: बिहार में दलित-पिछड़ा कार्ड से सत्ता की सियासत, राहुल गांधी की नई रणनीति या पुरानी सियासत की रीपैकेजिंग?**
**पटना/दरभंगा** – 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। इस बार की सियासत एक बार फिर *जातीय संतुलन* और *सामाजिक न्याय* के इर्द-गिर्द घूमती नजर आ रही है। और कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने ‘फुले’ फिल्म देखकर, दरभंगा के अंबेडकर छात्रावास में छात्रों से संवाद कर, एक स्पष्ट संदेश देने की कोशिश की है—**दलित-पिछड़ा वोट बैंक कांग्रेस के एजेंडे के केंद्र में है।**
### ‘फुले’ फिल्म और राहुल की राजनीतिक पटकथा
राहुल गांधी ने पटना में ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले के जीवन पर आधारित फिल्म ‘फुले’ देखी। यह फिल्म न केवल सामाजिक क्रांति की गाथा कहती है, बल्कि आज के राजनीतिक विमर्श में प्रतीकों के महत्व को भी रेखांकित करती है। राहुल गांधी का फिल्म देखना कोई साधारण घटनाक्रम नहीं, बल्कि एक सुविचारित राजनीतिक संदेश है।
उसके तुरंत बाद, उन्होंने दरभंगा में छात्रों से संवाद किया, प्रशासन की मनाही के बावजूद। इस घटनाक्रम ने उन्हें एक ‘प्रतिरोधी राजनेता’ के तौर पर प्रस्तुत किया, जो संस्थाओं की बंदिशों के बावजूद "दलित संवाद" को प्राथमिकता देता है।
### कांग्रेस की खोई ज़मीन और राहुल की चुनौती
90 के दशक से पहले कांग्रेस बिहार में ब्राह्मण, दलित और अल्पसंख्यकों का भरोसेमंद चेहरा थी। लेकिन मंडल आयोग और भाजपा की आक्रामक रणनीति ने कांग्रेस को पीछे धकेल दिया। अब राहुल गांधी उसी आधार को फिर से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। उनका ये बिहार दौरा इस साल का चौथा दौरा है। हर बार उन्होंने संविधान, शिक्षा और सामाजिक न्याय को मुद्दा बनाया है।
लेकिन सवाल ये है—क्या प्रतीकों की राजनीति, संवाद यात्रा और फिल्मों के जरिये कांग्रेस उस *ग्रासरूट नेटवर्क* की भरपाई कर पाएगी जो अब नदारद है?
### विपक्ष की प्रतिक्रिया: "फिल्म तो बहाना है"
बीजेपी ने राहुल गांधी की इस कोशिश को चुनावी ड्रामा बताया है। बिहार सरकार में मंत्री नीरज कुमार सिंह बबलू ने तंज कसते हुए कहा, “अगर फिल्म ही देखनी थी तो दिल्ली में क्यों नहीं देखी? बिहार क्यों आए?” उनका आरोप है कि राहुल गांधी चुनाव के समय भ्रम फैलाने और अफवाहें बनाने आते हैं।
उधर, गठबंधन सहयोगी RJD भी सतर्क है। तेजस्वी यादव की पार्टी जानती है कि दलित और पिछड़ा वर्ग उसके पारंपरिक वोट बैंक हैं, और कांग्रेस की एक्टिवनेस कहीं उनके वोट बैंक में सेंध न लगा दे।
### जानकार क्या कहते हैं?
वरिष्ठ पत्रकार सुनील पांडेय कहते हैं, “फिल्म देखना प्रतीकात्मक है। कांग्रेस अगर दलितों का भरोसा वापस पाना चाहती है, तो उसे संगठन के स्तर पर मेहनत करनी होगी। केवल टॉप लेवल नेताओं के दौरे से कुछ नहीं होगा।”
पत्रकार कौशलेंद्र प्रियदर्शी इसे "फिल्म के बहाने सत्ता तक पहुंचने की कवायद" बताते हैं। उनके अनुसार, "राहुल गांधी अब जाति जनगणना और 90 बनाम 10 की राजनीति कर रहे हैं। यह रणनीति बिहार में कितनी कारगर होगी, कहना मुश्किल है।"
### दलित वोट बैंक का गणित
बिहार की 19% आबादी दलित समुदाय की है। 38 विधानसभा सीटें इस वर्ग के लिए आरक्षित हैं। यानी एक बड़ा और निर्णायक वोट बैंक। यही वजह है कि कांग्रेस, बीजेपी, JDU और RJD—सभी की निगाहें इस समुदाय पर हैं।
2005 में नीतीश कुमार ने दलितों को महादलित में विभाजित कर एक नया सामाजिक समीकरण रचा था। कांग्रेस अब उसी वर्ग को फिर से संगठित करने की कोशिश कर रही है, लेकिन क्या वह नीतीश या मोदी के मजबूत जातीय समीकरण को चुनौती दे पाएगी?
### निष्कर्ष: राहुल की सियासी फिल्म हिट होगी या फ्लॉप?
राहुल गांधी की ‘फुले’ यात्रा एक विचारधारात्मक कदम है, पर इसे ज़मीन पर लागू करने के लिए कांग्रेस को असली लड़ाई संगठनात्मक ढांचे और स्थानीय नेतृत्व में लड़नी होगी। अभी बिहार में कांग्रेस सहयोगी की भूमिका में है, लेकिन वह खुद को विकल्प के तौर पर पेश करना चाहती है।
क्या दलित-पिछड़ा कार्ड 2025 के बिहार चुनाव में कांग्रेस को राजनीतिक संजीवनी देगा? या फिर यह भी बीते चुनावों की तरह, केवल एक और ‘प्रतीकात्मक यात्रा’ बनकर रह जाएगा?
इसका जवाब चुनाव के नतीजे देंगे। फिलहाल इतना तय है कि बिहार की सियासत में ‘सिंदूर’, ‘संविधान’ और ‘सामाजिक न्याय’—तीनों फिर से चुनावी विमर्श के केंद्र में हैं।
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