Rahul Gandhi की कांग्रेस को लेकर नई रणनीति? ओबीसी वर्ग को लुभाने........

Rahul Gandhi की कांग्रेस को लेकर नई रणनीति? ओबीसी वर्ग को लुभाने........


 YouTube video link....https://youtu.be/YIEffA9g6QA

कांग्रेस का 84वां अधिवेशन गुजरात के अहमदाबाद में दो दिनों तक चला और इस दौरान पार्टी ने केवल रणनीतिक समीक्षा ही नहीं की, बल्कि भविष्य की चुनावी दिशा भी तय करने की कोशिश की। इस अधिवेशन की सबसे बड़ी बात राहुल गांधी की उस राजनीतिक स्वीकारोक्ति को माना जा रहा है, जिसमें उन्होंने स्पष्ट कहा कि कांग्रेस अब तक दलित, मुस्लिम और ब्राह्मण वोट बैंक के इर्द-गिर्द ही घूमती रही, जबकि ओबीसी वर्ग पूरी तरह पार्टी से कट गया। राहुल गांधी का यह बयान कांग्रेस की सोच में बदलाव और उसकी नई रणनीतिक प्राथमिकताओं की झलक देता है।


सूत्रों के मुताबिक, राहुल गांधी ने यह भी कहा कि देश की करीब 50 फीसदी आबादी ओबीसी वर्ग से आती है और यह बड़ा सामाजिक तबका अब कांग्रेस से दूरी बना चुका है। ऐसे में यदि कांग्रेस को दोबारा चुनावी धार हासिल करनी है तो उसे इस वर्ग को फिर से जोड़ने के लिए पूरी ताकत झोंकनी होगी। यह नया ओबीसी मंत्र कांग्रेस की सियासी दिशा का संकेत है और भाजपा के ओबीसी चेहरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सीधी चुनौती देने की रणनीति का हिस्सा भी।


कांग्रेस इस दिशा में जमीन पर काम शुरू कर चुकी है। बिहार में हाल ही में किए गए संगठनात्मक फेरबदल इसका स्पष्ट संकेत हैं। अब पार्टी ने दलित समुदाय से आने वाले राजेश कुमार को बिहार कांग्रेस की कमान सौंपी है, जबकि इससे पहले भूमिहार समाज से आने वाले अखिलेश सिंह इस पद पर थे। पार्टी का प्रयास है कि "जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी" के फॉर्मूले पर चलते हुए ओबीसी, दलित और अन्य पिछड़े वर्गों को पार्टी में अधिक प्रतिनिधित्व दिया जाए।


यह भी उल्लेखनीय है कि कांग्रेस की यह नई सामाजिक समीकरण साधने की कवायद राहुल गांधी के उस "सामाजिक न्याय" एजेंडे से भी जुड़ी है, जो भारत जोड़ो यात्रा और अब भारत जोड़ो न्याय यात्रा के माध्यम से आकार ले रही है। लेकिन इस नए प्रयोग की पहली असली परीक्षा इस साल के अंत में होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव में होगी, जहां कांग्रेस को अपने सहयोगी दल राष्ट्रीय जनता दल (राजद) से ही ओबीसी नेतृत्व और वर्चस्व के मुद्दे पर टकराव का सामना करना पड़ सकता है।


उत्तर प्रदेश में भी समाजवादी पार्टी के साथ तालमेल में इसी वर्ग को लेकर प्रतिस्पर्धा कांग्रेस के सामने एक चुनौती होगी। क्योंकि यह क्षेत्रीय दल पहले से ओबीसी राजनीति का मजबूत आधार बन चुके हैं। ऐसे में कांग्रेस के लिए यह नई लाइन सिर्फ घोषणा नहीं, बल्कि ज़मीन पर गंभीर काम और सधे हुए सामाजिक संतुलन की भी मांग करती है।


कुल मिलाकर, कांग्रेस की सियासत एक नए मोड़ पर है। राहुल गांधी का ओबीसी कार्ड भाजपा की ताकत को उसी के सामाजिक आधार पर चुनौती देने का संकेत देता है। लेकिन यह आसान राह नहीं है। पार्टी को न केवल आंतरिक संगठन को ओबीसी केंद्रित बनाना होगा, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उसकी कथनी और करनी में कोई विरोधाभास न हो। अब देखना होगा कि यह नई रणनीति कांग्रेस को राजनीतिक पुनर्जीवन देती है या फिर पुराने वोट बैंक की नाराज़गी का सबब बनती है।

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