कन्हैया-पप्पू के पत्ते खोलने बिहार आ रहे Rahul Gandhi,तेजस्वी से टकराव की आशंका हलचल तेज!
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**कांग्रेस की चाल, तेजस्वी की ढाल और कन्हैया का कमाल? बिहार में महागठबंधन का असली इम्तिहान शुरू!**
बिहार में इस साल के अंत तक विधानसभा चुनाव होने हैं और जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे सियासी हलचल तेज होती जा रही है। एनडीए पहले ही नीतीश कुमार को चेहरा घोषित कर चुका है, लेकिन महागठबंधन के भीतर अब भी घमासान मचा हुआ है। खासकर कांग्रेस की भूमिका को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। इन सबके बीच राहुल गांधी के 7 अप्रैल को होने वाले बिहार दौरे को बेहद अहम माना जा रहा है।
कांग्रेस ने बिहार में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए कन्हैया कुमार को मैदान में उतारा है। 'पलायन रोको, नौकरी दो' यात्रा के बहाने कांग्रेस एक बार फिर जनता से सीधा जुड़ाव बनाने की कोशिश कर रही है। लेकिन असली पेंच ये है कि क्या कन्हैया सिर्फ कैंपेन तक सीमित रहेंगे या उन्हें विधानसभा चुनाव में किसी बड़ी भूमिका में देखा जाएगा?
राजद सुप्रीमो लालू यादव और नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव की चिंता भी इसी को लेकर है। लालू यादव शुरू से कन्हैया कुमार को तेजस्वी के संभावित प्रतियोगी के तौर पर देखते आए हैं। यही वजह है कि बीते चुनावों में भी तेजस्वी ने कन्हैया को टिकट देने का विरोध किया था। वहीं, पप्पू यादव का नाम आते ही आरजेडी खेमा असहज हो जाता है। लोकसभा चुनाव में तेजस्वी ने उन्हें हराने के लिए पूरा दम लगा दिया था, लेकिन सफलता नहीं मिली।
अब राहुल गांधी के सामने दोहरी चुनौती है—एक तरफ उन्हें अपने पसंदीदा नेताओं कन्हैया और पप्पू को मजबूत भूमिका दिलानी है, दूसरी तरफ महागठबंधन को भी एकजुट रखना है। कांग्रेस के पास फिलहाल न तो कोई स्पष्ट रणनीति है और न ही कोई सीएम फेस। प्रभारी कृष्णा अल्लावरू साफ कह चुके हैं कि पार्टी अभी चुनावी मुद्दों और जनता की समस्याओं पर फोकस कर रही है, सीट बंटवारे या चेहरे पर कोई फैसला नहीं हुआ है।
लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि कांग्रेस अब बिहार में आरजेडी की बी टीम नहीं बनना चाहती। पार्टी बूथ स्तर तक खुद को मज़बूत करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में अगर तेजस्वी को गठबंधन का नेता माना भी जाए, तो क्या कन्हैया और पप्पू की भूमिका सीमित रह पाएगी? यही सवाल कांग्रेस की चाल को जटिल बना रहा है।
राहुल गांधी का यह दौरा तय करेगा कि महागठबंधन में किसका दबदबा रहेगा। क्या कन्हैया को कांग्रेस बिहार का चेहरा बनाएगी? क्या तेजस्वी उन्हें स्वीकारेंगे? क्या पप्पू यादव को किनारे किया जाएगा या उन्हें भी कोई अहम भूमिका दी जाएगी?
फिलहाल तस्वीर धुंधली है, लेकिन इतना तय है कि बिहार में इस बार सियासत सिर्फ गठबंधन की नहीं, आत्मसम्मान, महत्वाकांक्षा और रणनीति की भी जंग होगी।
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