Prashant Kishor की 'बिहार बदलाव यात्रा' का एलान: जेपी की धरती से उठेगा क्रांति का बिगुल

Prashant Kishor की 'बिहार बदलाव यात्रा' का एलान: जेपी की धरती से उठेगा क्रांति का बिगुल


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**प्रशांत किशोर की 'बिहार बदलाव यात्रा' का एलान: जेपी की धरती से उठेगा क्रांति का बिगुल**  

*लेखिका: राधा राणा*

चुनावी रणनीतिकार और जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर एक बार फिर बिहार की राजनीतिक ज़मीन को हिला देने के लिए तैयार हैं। इस बार वे किसी पार्टी के लिए रणनीति नहीं बना रहे, बल्कि खुद बदलाव की अगुवाई करने के लिए ‘बिहार बदलाव यात्रा’ पर निकल रहे हैं। 20 मई से शुरू हो रही यह यात्रा महज एक राजनीतिक पहल नहीं, बल्कि बिहार में सामाजिक और संरचनात्मक क्रांति लाने की एक बड़ी कोशिश मानी जा रही है। खास बात यह है कि इस यात्रा की शुरुआत स्वतंत्रता संग्राम सेनानी जय प्रकाश नारायण की जन्मभूमि सिताबदियारा से की जाएगी, जिससे साफ है कि पीके इस यात्रा को संपूर्ण क्रांति की नई रूपरेखा देना चाहते हैं।

प्रशांत किशोर ने हाल ही में अपने एक दिवसीय जमुई दौरे में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान इस यात्रा की घोषणा की। उन्होंने कहा कि 'बिहार बदलाव यात्रा' का उद्देश्य जेपी के अधूरे सपनों को पूरा करना, व्यवस्था परिवर्तन की नींव रखना और युवाओं को पलायन की मजबूरी से मुक्त कराना है। उनका मानना है कि बिहार को सिर्फ रेलगाड़ियां नहीं, बल्कि फैक्ट्रियां और आधुनिक बुनियादी ढांचा चाहिए, ताकि यहां के युवा अपने ही राज्य में रहकर अपना भविष्य बना सकें।

पीके ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि जब गुजरात में एक लाख करोड़ रुपये की लागत से बुलेट ट्रेन बनाई जा सकती है, तो बिहार में क्यों नहीं आधुनिक औद्योगिक शहर (गिफ्ट सिटी) बन सकती? उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि बिहार में नई ट्रेनें सिर्फ इसलिए शुरू की जा रही हैं ताकि यहां के युवा उन ट्रेनों से गुजरात जाकर मजदूरी करें। अगर बिहार में ही फैक्ट्रियां होतीं, तो इन्हें पलायन नहीं करना पड़ता।

यह पहला मौका नहीं है जब प्रशांत किशोर बिहार की सड़कों पर उतरे हैं। इससे पहले वे दो साल तक प्रदेश में पदयात्रा कर लोगों से सीधा संवाद कर चुके हैं। अब जब 2025 के विधानसभा चुनाव नज़दीक हैं, उनकी यह नई यात्रा न केवल चुनावी जमीन तैयार करने की कवायद है, बल्कि एक वैचारिक आंदोलन की नींव भी हो सकती है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पीके की यह यात्रा पारंपरिक राजनीति से अलग होगी। वे जाति या धर्म की राजनीति से ऊपर उठकर नीति, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी मुद्दों को लेकर जनता के बीच जा रहे हैं। बिहार की राजनीति में जहां जातिगत समीकरणों का बोलबाला है, वहां पीके का यह प्रयास एक नया राजनीतिक मॉडल पेश कर सकता है।

‘बिहार बदलाव यात्रा’ को लेकर युवाओं और बुद्धिजीवियों में खासा उत्साह देखा जा रहा है। पीके के पुराने अनुभव और ज़मीनी समझ उन्हें एक प्रभावशाली जन नेता के रूप में स्थापित कर सकते हैं। हालांकि यह देखना अभी बाकी है कि जनता उन्हें सिर्फ रणनीतिकार के रूप में याद रखती है या एक बदलाव लाने वाले नेता के रूप में स्वीकार करती है।

सिताबदियारा से शुरू होने वाली यह यात्रा सिर्फ प्रशांत किशोर की राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं, बल्कि एक प्रदेश के सपनों और संघर्षों की आवाज़ भी बन सकती है। अगर यह यात्रा सफल होती है, तो यह बिहार की राजनीति को एक नया मोड़ दे सकती है — एक ऐसा मोड़, जहां मुद्दे होंगे, योजनाएं होंगी और बदलाव की उम्मीद होगी।

अब यह जनता के हाथ में है कि वह इस बदलाव की बयार को अपनाती है या फिर इसे सिर्फ एक और राजनीतिक यात्रा मानकर नज़रअंदाज़ करती है। पर फिलहाल इतना तो तय है कि बिहार में बदलाव की आहट सुनाई देने लगी है — और इस बार इसकी शुरुआत हो रही है जेपी की धरती से।

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