प्रशांत किशोर का बड़ा बयान - चिराग पासवान और कन्हैया कुमार को बिहार लौटकर करनी चाहिए ज़मीनी राजनीति !
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बिहार की सियासत में एक बार फिर हलचल मचाने वाला बयान सामने आया है और इस बार यह बयान दिया है चुनावी रणनीतिकार से नेता बने जन सुराज अभियान के संस्थापक प्रशांत किशोर ने। प्रशांत किशोर ने सीधे तौर पर दो बड़े नामों — चिराग पासवान और कन्हैया कुमार — को बिहार की राजनीति में सक्रिय होने की सलाह दी है। उनका कहना है कि बिहार की राजनीति में अब बदलाव की ज़रूरत है और इस बदलाव की दिशा में चिराग और कन्हैया जैसे नेताओं को अपना महत्त्वपूर्ण योगदान देना चाहिए। प्रशांत किशोर ने साफ शब्दों में कहा कि जो नेता सच में बिहार के भविष्य को संवारना चाहते हैं, उन्हें अब मैदान में उतरना होगा और सिर्फ़ दिल्ली की सत्ता की कुर्सी से संतुष्ट नहीं रहना चाहिए।
प्रशांत किशोर ने कहा कि चिराग पासवान जैसे नेता को अब केंद्र की राजनीति से मोह छोड़कर, बिहार की ज़मीन पर उतरकर सच्ची राजनीति करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि चिराग पासवान के पास अब भी मौका है कि वह मंत्री पद का लोभ छोड़ें और अपने पिता रामविलास पासवान की तरह बिहार के लिए कुछ ठोस काम करें। प्रशांत किशोर ने यह भी कहा कि यह बिहार के लिए बेहद अच्छा होगा अगर चिराग फिर से लौटकर यहां सक्रिय राजनीति करें, क्योंकि राज्य को नए चेहरों और नई सोच की सख्त जरूरत है।
इतना ही नहीं, उन्होंने कांग्रेस नेता कन्हैया कुमार का भी जिक्र करते हुए कहा कि कन्हैया कुमार जैसे तेज-तर्रार नेताओं को भी बिहार की राजनीति में आकर संघर्ष करना चाहिए। बिहार में सियासी हालात को देखते हुए प्रशांत किशोर ने यह भी कहा कि लालू यादव और नीतीश कुमार के चेहरे अब पुराने हो चले हैं और समय की मांग है कि बिहार में नई राजनीतिक धारा बहे। प्रशांत किशोर का यह बयान यह भी साफ इशारा करता है कि बिहार की राजनीति में पुरानी पीढ़ी के नेताओं के साथ-साथ अब युवा नेताओं की एक नई सोच और ऊर्जा की आवश्यकता है।
प्रशांत किशोर ने कहा कि अगर चिराग पासवान केंद्र में मंत्री का पद छोड़कर बिहार की राजनीति में पूरा समय देंगे, तो निश्चित तौर पर राज्य को एक मजबूत नेता मिल सकता है। हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि यह कदम फिलहाल कठिन नज़र आता है क्योंकि राजनीति में पद और सत्ता का मोह छोड़ना आसान नहीं है। चिराग पासवान 2020 के विधानसभा चुनावों में भी एनडीए से अलग होकर चुनावी मैदान में उतरे थे और उस समय जेडीयू की कई सीटों पर बड़ा असर डाला था। लेकिन अब चिराग एनडीए के हिस्से हैं, और यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले चुनाव में वो किस तरह का राजनीतिक फैसला लेते हैं।
वहीं, कन्हैया कुमार की बात करें तो प्रशांत किशोर ने यह स्पष्ट किया कि अगर बिहार में नई राजनीति को मजबूत करना है तो कन्हैया कुमार जैसे नेताओं को सिर्फ़ टीवी डिबेट और सोशल मीडिया की राजनीति से हटकर ज़मीनी राजनीति करनी होगी। उन्होंने कहा कि बिहार में बदलाव लाना है तो ज़मीन पर उतरकर जनता के बीच रहना ज़रूरी है। नारा लगाने से और भाषण देने से बदलाव नहीं आएगा, उसके लिए जमीनी स्तर पर मेहनत करनी पड़ेगी।
प्रशांत किशोर ने इस बातचीत के दौरान यह भी कहा कि बिहार की राजनीति में लंबे समय से एक ही चेहरों का वर्चस्व है — लालू यादव, नीतीश कुमार और उनके इर्द-गिर्द घूमती राजनीति अब थक चुकी है। ऐसे में अगर बिहार को एक नई दिशा देनी है तो नए नेताओं को आगे आना होगा। चिराग पासवान और कन्हैया कुमार जैसे युवा नेताओं में वह क्षमता है कि वे राज्य की राजनीति में एक बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं, लेकिन इसके लिए उन्हें अपने सुरक्षित और आरामदायक राजनीतिक दायरे से बाहर निकलकर बिहार की जमीनी राजनीति में उतरना ही होगा।
उन्होंने यह भी जोड़ा कि चाहे चिराग पासवान हों, कन्हैया कुमार हों, तेजस्वी यादव हों या खुद मैं यानी प्रशांत किशोर — जो भी नेता बिहार में राजनीति करना चाहता है उसे यह तय करना होगा कि वह किस रास्ते पर चलना चाहता है। केवल मीडिया की सुर्खियों में बने रहने से बिहार की राजनीति में बदलाव संभव नहीं है, इसके लिए ठोस प्लान और जमीनी स्तर पर काम करने की आवश्यकता है।
अंत में प्रशांत किशोर ने यह भी कहा कि बिहार जैसे राज्य में नीतिगत बदलाव की सबसे ज्यादा जरूरत है और यह तभी संभव है जब राज्य में नई सोच के साथ राजनीति की दिशा तय की जाए। चिराग पासवान के पास पिता की राजनीतिक विरासत है और कन्हैया कुमार के पास युवाओं का उत्साह, अगर ये दोनों नेता बिहार की राजनीति में सक्रिय होते हैं तो राज्य की राजनीति में एक नई करवट देखने को मिल सकती है।
इस बयान के बाद बिहार की सियासत में चर्चाओं का दौर गर्म है। क्या वाकई चिराग पासवान केंद्र की राजनीति छोड़ बिहार की तरफ रुख करेंगे? क्या कन्हैया कुमार अपनी दिल्ली की राजनीति से हटकर बिहार में सक्रिय होंगे? यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन प्रशांत किशोर का यह बयान बिहार की राजनीति में नए समीकरणों के संकेत जरूर देता है।
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