अगर मंदिर सरकारी नियंत्रण में,तो मस्जिद-चर्च क्यों नहीं?" — विहिप का बड़ा सवाल

अगर मंदिर सरकारी नियंत्रण में,तो मस्जिद-चर्च क्यों नहीं?" — विहिप का बड़ा सवाल

 
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**"अगर मंदिर सरकारी नियंत्रण में, तो मस्जिद-चर्च क्यों नहीं?" — विहिप का बड़ा सवाल**

देश में धर्मनिरपेक्षता और समान अधिकार की बहस एक बार फिर तेज हो गई है। इस बार ये चर्चा किसी कोर्ट के फैसले या राजनीतिक बयान से नहीं, बल्कि विश्व हिंदू परिषद यानी विहिप की एक सीधी और तीखी मांग से शुरू हुई है। विहिप के केंद्रीय संगठन महामंत्री मिलिंद परांडे ने बिहार के डिप्टी सीएम विजय सिन्हा से मुलाकात के दौरान साफ कहा कि अगर सरकार हिंदू मंदिरों को अपने नियंत्रण में रख सकती है, तो फिर मस्जिदों और चर्चों को क्यों नहीं? यह दोहरा मापदंड आखिर कब तक चलेगा

मिलिंद परांडे का कहना है कि यह धर्मनिरपेक्षता के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। संविधान कहता है कि सभी धर्मों को बराबरी का दर्जा मिलना चाहिए, तो फिर केवल मंदिरों पर ही प्रशासनिक पकड़ क्यों? उन्होंने इसे सीधा-सीधा भेदभाव बताया है। उनके मुताबिक, वर्तमान में केवल हिंदू मंदिर ही सरकारी नियंत्रण में हैं, जबकि मस्जिदें और चर्च पूरी तरह उनके निजी धार्मिक संगठनों द्वारा चलाए जा रहे हैं।


विहिप की इस मांग को केवल धार्मिक चश्मे से नहीं देखा जा सकता। यह सवाल एक बड़ी संवैधानिक बहस को जन्म देता है—क्या एक धर्म के धार्मिक स्थलों पर सरकारी हस्तक्षेप और दूसरे धर्मों को पूर्ण स्वतंत्रता देना सही है? क्या यह आस्था के साथ-साथ सामाजिक और राजनीतिक असमानता को बढ़ावा नहीं देता?


दरअसल, भारत में कई बड़े मंदिर ट्रस्ट के जरिए चलते हैं, लेकिन उन पर राज्य सरकारों की सख्त निगरानी और नियंत्रण होता है। मंदिरों की संपत्ति, चढ़ावा, और प्रबंधन को लेकर सरकार की भूमिका रहती है, जबकि दूसरी ओर मस्जिदों और चर्चों को उनके समुदाय के संगठन स्वायत्तता से चलाते हैं। विहिप का कहना है कि यह व्यवस्था न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि एक धर्म के अनुयायियों के साथ भेदभाव भी है।


विहिप नेताओं ने इस मुद्दे को लेकर बिहार के डिप्टी सीएम विजय सिन्हा से मुलाकात की। इस मुलाकात में विहिप के कई वरिष्ठ पदाधिकारी भी मौजूद रहे — जैसे केंद्रीय मंत्री अम्बरीष, क्षेत्र मंत्री वीरेंद्र विमल, क्षेत्र संगठन मंत्री आनंद और प्रान्त मंत्री संतोष। सभी ने मिलकर यह स्पष्ट किया कि यह केवल एक मांग नहीं, बल्कि एक अधिकार की बात है।


मिलिंद परांडे ने कहा कि अगर सरकार सच में धर्मनिरपेक्ष है, तो उसे सभी धार्मिक स्थलों को एक समान नजर से देखना होगा। उनका कहना था कि जब सरकार मंदिरों की कमाई और कार्यप्रणाली पर नियंत्रण रख सकती है, तो फिर मस्जिदों और चर्चों को इस नियम से बाहर क्यों रखा गया है?


उन्होंने यह भी कहा कि इस भेदभाव ने हिंदू समाज के बीच असंतोष को जन्म दिया है। जब एक ही देश में, एक ही संविधान के तहत, एक ही कानून सभी पर लागू होना चाहिए, तो फिर इस तरह की असमानता क्यों है? क्या धर्मनिरपेक्षता का अर्थ केवल हिंदू आस्थाओं को नियंत्रित करना और बाकी को छूट देना है?


इस पूरी बहस के केंद्र में वक्फ बोर्ड की भूमिका भी है। विहिप का कहना है कि वक्फ बोर्ड के पास देशभर में हजारों करोड़ की संपत्ति है, लेकिन उसकी पारदर्शिता पर कोई निगरानी नहीं है। वहीं, मंदिरों के ट्रस्ट को हर छोटी-बड़ी बात में प्रशासन से मंजूरी लेनी पड़ती है।


मस्जिदों और चर्चों पर नियंत्रण को लेकर अभी तक किसी भी राजनीतिक दल ने खुलकर प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन विहिप का यह मुद्दा आने वाले समय में एक बड़ा चुनावी मुद्दा भी बन सकता है। खासकर जब बात समानता और धार्मिक अधिकारों की हो, तब सरकार की जवाबदेही और बढ़ जाती है।


यह सवाल केवल प्रशासनिक नहीं, सामाजिक और सांविधानिक भी है। अगर किसी धर्म के धार्मिक स्थल को सरकार नियंत्रित करती है तो वही नियम बाकी धर्मों पर भी लागू होने चाहिए, तभी जाकर सही मायनों में ‘सबका साथ, सबका विकास’ और धर्मनिरपेक्ष भारत की परिकल्पना पूरी होगी।


विहिप ने यह भी संकेत दिए हैं कि अगर इस दिशा में सरकार कोई कदम नहीं उठाती, तो वह आगे आंदोलन की रणनीति पर विचार कर सकती है। अब देखना होगा कि सरकार इस मांग को किस नजर से देखती है — एक लोकतांत्रिक मांग के तौर पर या एक विवादास्पद मुद्दे के रूप में।


लेकिन एक बात तय है — यह बहस अब थमेगी नहीं। विहिप ने जो सवाल उठाया है, वह अब जनता के बीच भी चर्चा का विषय बन चुका है। मंदिर, मस्जिद और चर्च — इन सभी स्थलों को लेकर भारत की सरकार किस तरह की नीतियां अपनाती है, यह आने वाले दिनों में साफ हो जाएगा।


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