तेजस्वी पर महागठबंधन में घमासान — कांग्रेस में बढ़ी कलह,
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**तेजस्वी पर महागठबंधन में घमासान — कांग्रेस में बढ़ी कलह, अखिलेश सिंह ने पार्टी नेताओं को घेरा, तेजस्वी को बताया CM का असली चेहरा!**
बिहार की राजनीति में विधानसभा चुनाव से पहले सियासी हलचल तेज हो गई है। एनडीए ने एक बार फिर से मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर नीतीश कुमार पर भरोसा जताया है, लेकिन महागठबंधन में अभी भी सीएम फेस को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। इस कशमकश के बीच तेजस्वी यादव के नाम पर कांग्रेस के भीतर ही घमासान छिड़ गया है।
दरअसल, शुक्रवार को पटना में कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव सचिन पायलट ने कन्हैया कुमार की पदयात्रा के समापन कार्यक्रम में एक बयान दिया जिसने सियासी पारा और चढ़ा दिया। सचिन पायलट ने कहा कि मुख्यमंत्री का चेहरा चुनाव बाद तय किया जाएगा। इस बयान ने महागठबंधन के भीतर पुराने घाव पर फिर से नमक छिड़क दिया।
राजद पहले ही तेजस्वी यादव को अपना मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित कर चुका है और अब यह बात कांग्रेस के अंदर विरोध का कारण बन गई है। बिहार कांग्रेस प्रभारी कृष्णा अल्लावरू भी तेजस्वी के नाम पर खुलकर हामी भरने से बच रहे हैं। इसी बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद अखिलेश सिंह ने एक बड़ा बयान देकर कांग्रेस के अंदर मची कलह को सतह पर ला दिया।
अखिलेश सिंह ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि तेजस्वी यादव ही महागठबंधन के मुख्यमंत्री पद के चेहरे हैं और इसमें किसी को कोई कंफ्यूजन नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि 2020 के विधानसभा चुनाव में भी तेजस्वी ही सीएम फेस थे और इस बार भी वही चेहरा रहेंगे। अखिलेश सिंह ने यहां तक कह दिया कि जो नेता चुनाव बाद सीएम फेस तय करने की बात कर रहे हैं, वे राजनीति की समझ नहीं रखते।
अखिलेश सिंह ने भाजपा का उदाहरण देते हुए कहा कि केंद्र में सरकार चलाने वाली भाजपा तक बिहार में अकेले चुनाव नहीं लड़ती। वह जेडीयू, चिराग पासवान, उपेंद्र कुशवाहा और जीतनराम मांझी जैसे नेताओं के साथ मिलकर चुनावी रण में उतरती है। ऐसे में कांग्रेस अगर अकेले चुनाव लड़ने की सोच रही है तो यह एक आत्मघाती कदम साबित होगा।
इस बयान से साफ है कि कांग्रेस के अंदर तेजस्वी को लेकर गुटबाजी बढ़ गई है। एक तरफ अखिलेश सिंह तेजस्वी के नाम पर अपनी सहमति जता रहे हैं और राजद के स्टैंड का समर्थन कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ सचिन पायलट और कृष्णा अल्लावरू जैसे नेता चुनाव के बाद ही चेहरे के चयन की बात कर रहे हैं।
बिहार की राजनीति में चेहरा तय करना कोई छोटी बात नहीं होती। हर चुनाव में महागठबंधन और एनडीए के बीच सीधी टक्कर होती है, और इस बार भी दोनों ही खेमे अपनी रणनीति में कोई कमी नहीं छोड़ना चाहते। लेकिन कांग्रेस के अंदर उठती इस आवाज ने साफ कर दिया है कि महागठबंधन की एकता सिर्फ नाम मात्र की रह गई है।
सवाल यह है कि क्या कांग्रेस और राजद के बीच यह विवाद वक्त रहते सुलझ पाएगा या फिर इसका सीधा फायदा एनडीए को मिलेगा। वैसे भी, बिहार की राजनीति में चेहरे से ज्यादा तालमेल अहम होता है और अभी के हालात में महागठबंधन के बीच तालमेल की कमी साफ नजर आ रही है।
तेजस्वी यादव भले ही चुप हैं, लेकिन उनके समर्थक और राजद के नेता लगातार उन्हें मुख्यमंत्री पद का मजबूत दावेदार बताते आ रहे हैं। कांग्रेस के भीतर की कलह ने इस बात की संभावना और भी पक्की कर दी है कि चुनाव से पहले महागठबंधन की मुश्किलें कम होने की बजाय और ज्यादा बढ़ सकती हैं।
अब देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस अपनी स्थिति में कोई बदलाव लाती है या फिर महागठबंधन का यह तनाव एनडीए के लिए संजीवनी बनकर सामने आता है। बिहार की राजनीति में अगले कुछ हफ्तों में क्या नया मोड़ आता है, इस पर सबकी नजरें टिकी रहेंगी।
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