भीषण गर्मी में बिहार के खेल मंत्री ने बांटे 600 कंबल, सफाई में बोले– "ये कंबल नहीं, पतली चादर है"
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**भीषण गर्मी में बिहार के खेल मंत्री ने बांटे 600 कंबल, सफाई में बोले– "ये कंबल नहीं, पतली चादर है"**
बिहार की राजनीति में एक अजीब वाकया सामने आया है, जिसने सभी को चौंका दिया है। बेगूसराय के मंसूरचक प्रखंड क्षेत्र के अहियापुर गांव में भाजपा के 46वें स्थापना दिवस के मौके पर आयोजित कार्यक्रम में बिहार सरकार के खेल मंत्री सुरेंद्र कुमार मेहता ने भीषण गर्मी के बीच 600 लोगों को कंबल बांट दिए। यह तब हुआ जब इलाके का तापमान 32 डिग्री सेल्सियस से अधिक था।
जैसे ही इस कार्यक्रम की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुईं, लोगों ने सवाल उठाने शुरू कर दिए। गर्मी में कंबल बांटने को लेकर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं आने लगीं। किसी ने पूछा कि ठंड में मंत्री जी कहां थे, तो किसी ने कहा कि ये गरीबों की ज़रूरत नहीं, बल्कि दिखावे की राजनीति है।
विवाद बढ़ता देख खुद खेल मंत्री सुरेंद्र मेहता ने सफाई दी। उन्होंने कहा कि "जो बांटा गया है, वो कंबल नहीं बल्कि पतली चादर है, जिसे नीचे बिछाकर सोया जा सकता है।" उन्होंने आगे कहा, "चांदी के चम्मच में खाने वाले गरीबी को नहीं समझ सकते। बहुत सारे लोग ऐसे हैं जिनके पास ज़मीन पर बिछाने के लिए भी कुछ नहीं होता। उनके लिए ये चादरें मददगार होंगी।"
इस बयान के बाद भी मामला शांत नहीं हुआ। सोशल मीडिया पर यूज़र्स ने मंत्री के बयान पर भी तंज कसना शुरू कर दिया। कुछ लोगों ने लिखा कि ‘गरीबी का मजाक मत बनाइए’, तो किसी ने इसे ‘राजनीतिक स्टंट’ बताया।
कार्यक्रम के दौरान मंत्री सुरेंद्र मेहता ने भाजपा की विचारधारा और संगठन पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि भाजपा कार्यकर्ताओं की आत्मा है और यह पार्टी देश के हर कोने में मज़बूती से खड़ी है। उन्होंने कहा कि काम करने वाली पार्टी को ही जनता याद रखती है।
हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या वास्तव में गरीबों की मदद के नाम पर इस तरह के कार्यक्रम जरूरी हैं? क्या गर्मी में कंबल या चादर बांटना ज़रूरतमंदों की असल समस्या का समाधान है, या यह सिर्फ एक राजनीतिक प्रचार का हिस्सा?
एक तरफ बिहार में गर्मी और लू से लोग बेहाल हैं, बिजली-पानी की समस्या बनी हुई है, वहीं दूसरी ओर इस तरह के आयोजन यह सोचने पर मजबूर कर देते हैं कि नेताओं की प्राथमिकता क्या है—जनता की ज़रूरतें या फोटो खिंचवाने के मौके?
अब देखना होगा कि जनता इस सफाई को कितनी गंभीरता से लेती है और आने वाले समय में ऐसे आयोजनों को लेकर नेताओं की सोच में कोई बदलाव आता है या नहीं।
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