JNU छात्रसंघ अध्यक्ष बने बिहार के Nitish Kumar: मोदी समर्थक से वामपंथी नेता तक का रोचक सफर
YouTube video link....https://youtu.be/YJZ-NQbz0ZE
जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष बने बिहार के नीतीश कुमार: मोदी समर्थक से वामपंथी नेता तक का रोचक सफर
देश के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में से एक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) ने एक बार फिर बिहार के बेटे को छात्रसंघ अध्यक्ष चुना है। अररिया जिले के नीतीश कुमार ने इस बार अध्यक्ष पद पर जीत हासिल की है। लेकिन नीतीश का यह सफर जितना प्रेरणादायक है, उतना ही दिलचस्प भी। बचपन में आरएसएस की विचारधारा से पढ़ाई करने वाले नीतीश कुमार कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बड़े समर्थक हुआ करते थे। लेकिन समय के साथ सोच बदली, परिस्थितियां बदलीं और आज वे वामपंथी विचारधारा के प्रखर नेता के रूप में उभरे हैं।
नीतीश कुमार का बचपन एक साधारण किसान परिवार में बीता। उनकी प्रारंभिक शिक्षा फारबिसगंज के एक कॉन्वेंट स्कूल से शुरू हुई। हालांकि, पढ़ाई से संतुष्ट नहीं होने पर उनका दाखिला आरएसएस से जुड़े सरस्वती विद्या मंदिर में कराया गया, जहां उन्होंने 10वीं तक की पढ़ाई पूरी की। उनके पिता प्रदीप कुमार यादव एक किसान होने के साथ-साथ एक वित्त रहित कॉलेज में शिक्षक भी हैं। नीतीश के परिवार में राजनीति का भी गहरा असर रहा है। उनके चाचा जयप्रकाश यादव भाजपा के विधायक हैं। इसके बावजूद नीतीश ने अपनी अलग विचारधारा और रास्ता चुना।
पूर्णिया कॉलेज से इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी करने के बाद नीतीश स्नातक के लिए बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) पहुंचे। बीएचयू में पढ़ाई के दौरान वे प्रधानमंत्री मोदी के बड़े प्रशंसक रहे और उनका सपना था कि वे एक दिन आइएएस अधिकारी बनें। लेकिन जब नीतीश कुमार ने जेएनयू में दाखिला लिया, तो वहां का वातावरण, बहस की संस्कृति और वामपंथी विचारधारा ने उनके सोचने का नजरिया बदल दिया। अब नीतीश का लक्ष्य समाज सेवा और छात्रों के अधिकारों की लड़ाई बन गया है।
जेएनयू के छात्रसंघ चुनाव में नीतीश कुमार आइसा और डीएसएफ के वाम गठबंधन की ओर से उम्मीदवार थे। उन्होंने न सिर्फ अध्यक्ष पद पर जीत हासिल की, बल्कि उपाध्यक्ष और महासचिव जैसे महत्वपूर्ण पदों पर भी वाम गठबंधन ने कब्जा जमाया। नीतीश की यह जीत एक साधारण गांव से निकले युवा के अद्भुत हौसले और मेहनत का परिणाम है।
चुनाव जीतने के बाद नीतीश ने साफ कहा कि वे छात्रों के अधिकारों की रक्षा करेंगे और शिक्षा के निजीकरण के खिलाफ आवाज बुलंद करते रहेंगे। उन्होंने कहा कि जेएनयू जैसे संस्थानों की लोकतांत्रिक परंपरा को बचाना उनका मुख्य लक्ष्य रहेगा। नीतीश का यह बयान बताता है कि वे अपनी जिम्मेदारी को गंभीरता से समझते हैं और अपने साथियों के विश्वास पर खरा उतरने का इरादा रखते हैं।
नीतीश कुमार का सफर आज के युवाओं के लिए एक बड़ा संदेश है। यह कहानी बताती है कि हालात चाहे जैसे भी हों, सोच में परिवर्तन और बेहतर भविष्य के लिए संघर्ष कभी भी संभव है। बिहार के एक छोटे से गांव से निकलकर जेएनयू छात्रसंघ का नेतृत्व करना केवल नीतीश की मेहनत का प्रमाण नहीं है, बल्कि यह भी दिखाता है कि शिक्षा और विचारों का संगम किस तरह एक युवा के जीवन की दिशा बदल सकता है।
आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि नीतीश कुमार छात्र राजनीति से आगे बढ़कर किस तरह राष्ट्रीय राजनीति में अपना योगदान देते हैं। फिलहाल, उन्होंने यह साबित कर दिया है कि सोच बदलने और अपने सपनों के पीछे पूरी ताकत से दौड़ने का जज्बा हो तो कोई भी मंजिल दूर नहीं होती।
0 Response to "JNU छात्रसंघ अध्यक्ष बने बिहार के Nitish Kumar: मोदी समर्थक से वामपंथी नेता तक का रोचक सफर"
एक टिप्पणी भेजें