बिहार की राजनीति में नए चेहरों की दस्तक — क्या बदल पाएंगे सियासत का खेल?

बिहार की राजनीति में नए चेहरों की दस्तक — क्या बदल पाएंगे सियासत का खेल?


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**बिहार की राजनीति में नए चेहरों की दस्तक — क्या बदल पाएंगे सियासत का खेल?**

बिहार की सियासत हमेशा से दिलचस्प रही है। यहां राजनीति का खेल कब किस मोड़ पर पलट जाए, कहना मुश्किल होता है। अब एक बार फिर चुनावी मौसम की आहट के साथ नए-नए चेहरे राजनीति के मैदान में कदम रख चुके हैं। जहां पहले से ही नीतीश कुमार, लालू यादव और मोदी फैक्टर जैसे बड़े नामों का दबदबा रहा है, वहीं अब प्रशांत किशोर, आरसीपी सिंह, शिवदीप लांडे और आईपी गुप्ता जैसे नए खिलाड़ी सियासी चौसर पर अपने दांव आजमा रहे हैं।

इन चेहरों में सबसे पहले नाम आता है जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर का। पीके के नाम से मशहूर ये चुनावी रणनीतिकार अब खुद राजनीति के रण में कूद चुके हैं। उपचुनाव में जन सुराज पार्टी ने 10% वोट हासिल कर यह साफ कर दिया है कि बिहार के मतदाता अब तीसरे विकल्प की तलाश में हैं। वहीं, आरसीपी सिंह ने 'आसा' पार्टी बनाकर कुर्मी-कुशवाहा समाज को अपने साथ जोड़ने की कोशिश की है। 


इसके बाद सियासत में एंट्री की शिवदीप लांडे ने, जो कभी बिहार पुलिस में अपनी ईमानदारी और सख्ती के लिए चर्चित थे। उन्होंने ‘हिंद सेना’ नाम से अपनी पार्टी बनाई है और सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुके हैं। हालांकि लांडे पर बाहरी होने का ठप्पा भी लग चुका है, लेकिन राजनीति में कब कौन सा चेहरा जनता का दिल जीत ले, यह कहना मुश्किल है।  


वहीं पान व्यवसाय और कताई-बुनाई से जुड़े तांती-ततवा समाज के लिए इंडियन इन्कलाब पार्टी यानी 'आईआईपी' लेकर आए हैं इंजीनियर आईपी गुप्ता। वे अखिल भारतीय पान महासंघ के अध्यक्ष रहे हैं और अब राजनीति में अपनी पकड़ बनाने की कोशिश कर रहे हैं। 


बिहार की राजनीति में नए चेहरों का आना कोई नई बात नहीं, लेकिन ये चेहरे इस बार मतदाताओं को कितना प्रभावित कर पाते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा। जातीय समीकरणों पर आधारित राजनीति में इन नए दलों के लिए रास्ता आसान नहीं है, क्योंकि बिहार की राजनीति में पुराने घाघ नेताओं और गठबंधनों की जड़ें बहुत गहरी हैं। 


इन नए दलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी जनता के भरोसे को जीतना और अपने संगठन को मजबूत करना। उपचुनाव में जन सुराज पार्टी की सफलता ने यह इशारा जरूर कर दिया है कि जनता बदलाव चाहती है, लेकिन क्या ये नए चेहरे बिहार की राजनीति की तस्वीर बदल पाएंगे? इसका जवाब तो आने वाला चुनाव ही देगा।


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