बिहार की चीनी मिलों पर लालू-राबड़ी राज का ‘मीठा’ जख्म!

बिहार की चीनी मिलों पर लालू-राबड़ी राज का ‘मीठा’ जख्म!


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**बिहार की चीनी मिलों पर लालू-राबड़ी राज का ‘मीठा’ जख्म! 7 फैक्ट्रियां हुईं बंद, किसानों की कमर टूटी**  


बिहार, जिसे कभी ‘चीनी का कटोरा’ कहा जाता था, आज अपनी इस पहचान को लगभग खो चुका है। एक वक्त था जब उत्तर बिहार में गन्ने की मिठास हर खेत में महसूस की जाती थी, लेकिन वक्त ने करवट बदली और यह मिठास कड़वाहट में बदल गई। अब न वो चहल-पहल है, न ही गन्ने की मीठी खुशबू। स्वास्थ्य एवं विधि मंत्री मंगल पांडेय ने हाल ही में एक बड़ा बयान देते हुए आरजेडी और कांग्रेस शासनकाल (1985-2005) को कटघरे में खड़ा कर दिया। उनका दावा है कि इस दौरान बिहार की 16 में से 7 प्रमुख चीनी मिलें बंद हो गईं, जिससे लाखों किसानों और मजदूरों का भविष्य अंधकार में चला गया।  


### **कभी चीनी का हब था उत्तर बिहार, आज वीरान पड़े हैं मिलों के दरवाजे**  

बिहार के पश्चिम चंपारण, मधुबनी, मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर और मिथिलांचल क्षेत्र में कभी चीनी मिलों की धूम हुआ करती थी। गन्ने की खेती किसानों के लिए आय का मुख्य जरिया थी, और चीनी उद्योग से हजारों लोगों को रोजगार मिलता था। लेकिन 1990 के दशक से मिलों की हालत बिगड़ने लगी और धीरे-धीरे कई मिलें दम तोड़ गईं।  


मंगल पांडेय के अनुसार, लालू-राबड़ी के शासनकाल में बंद होने वाली चीनी मिलों की सूची लंबी है। इनमें पश्चिम चंपारण की चनपटिया चीनी मिल, मधुबनी की लोहट चीनी मिल, मुजफ्फरपुर की मोतीपुर चीनी मिल, समस्तीपुर जिला मुख्यालय की चीनी मिल, सकरी और रैयाम चीनी मिलें शामिल हैं। इन मिलों के बंद होने से न सिर्फ हजारों श्रमिक बेरोजगार हुए, बल्कि किसानों की आजीविका भी खतरे में पड़ गई।  


### **बंद मिलों से उजड़े हजारों परिवार, गन्ना किसानों की हालत बदतर**  

चीनी मिलों के बंद होने का सबसे बड़ा असर उन किसानों पर पड़ा, जो पीढ़ियों से गन्ने की खेती कर रहे थे। मिलें बंद होने के बाद किसानों को अपनी फसल औने-पौने दामों पर बेचनी पड़ी या फिर उन्हें गन्ने की खेती ही छोड़नी पड़ी। जो मजदूर मिलों में काम करते थे, उनके लिए भी रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया।  


बिहार के गन्ना किसान बताते हैं कि पहले वे अच्छी कमाई करते थे, लेकिन अब उन्हें लागत निकालना भी मुश्किल हो रहा है। गन्ने के अलावा कोई और नकदी फसल नहीं थी, जिससे वे मुनाफा कमा सकते थे। मजबूरी में कई किसानों ने पलायन का रास्ता अपना लिया और दूसरे राज्यों में मजदूरी करने चले गए।  


### **राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप, लेकिन समाधान कौन देगा?**  

मंगल पांडेय के बयान के बाद बिहार की राजनीति गरमा गई है। आरजेडी की ओर से इस आरोप पर पलटवार किया गया और कहा गया कि चीनी मिलों का संकट सिर्फ लालू-राबड़ी के शासन तक सीमित नहीं है, बल्कि पिछली सरकारों की नीतियों की भी इसमें भूमिका रही है।  


राजनीति चाहे जो भी हो, लेकिन सच्चाई यही है कि बिहार की चीनी मिलें एक-एक करके बंद होती गईं और कोई इन्हें दोबारा खड़ा करने के लिए ठोस कदम नहीं उठा पाया। समय-समय पर सरकारों ने मिलों को फिर से शुरू करने की घोषणाएं कीं, लेकिन ये बातें सिर्फ कागजों तक सीमित रह गईं।  


### **क्या बिहार अपनी खोई पहचान वापस पा सकेगा?**  

आज बिहार के किसानों और उद्योगपतियों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या राज्य एक बार फिर से ‘चीनी का कटोरा’ बन सकेगा? क्या बंद पड़ी मिलों को दोबारा शुरू किया जाएगा? अगर हां, तो इसका फायदा किसे मिलेगा—किसानों को या फिर बड़े कारोबारियों को?  


सरकारें आती-जाती रहेंगी, लेकिन जब तक किसानों और उद्योगों की सही नीति नहीं बनेगी, तब तक न तो गन्ने की मिठास लौटेगी और न ही बिहार की चीनी मिलें दोबारा गुलजार हो पाएंगी।

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