बिहार को मिली नमो भारत एक्सप्रेस की सौगात, 24 अप्रैल को झंझारपुर से पीएम मोदी दिखाएंगे हरी झंडी

बिहार को मिली नमो भारत एक्सप्रेस की सौगात, 24 अप्रैल को झंझारपुर से पीएम मोदी दिखाएंगे हरी झंडी


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बिहार की सियासत में इस वक्त सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बना हुआ है राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सेहत और उनकी बिगड़ती हालत के बीच सरकार की नई व्यवस्था। लंबे समय से ऐसी खबरें सामने आ रही हैं कि नीतीश कुमार की तबीयत लगातार खराब होती जा रही है। सार्वजनिक मंचों पर उनकी उपस्थिति के दौरान ये बात और भी साफ नजर आने लगी है। कभी किसी कार्यक्रम में वे आरती की थाली हाथ में लेकर घुमाना भूल जाते हैं, तो कभी किसी सभा में एक शब्द भी नहीं बोल पाते। उनके इस स्वास्थ्य संकट ने बिहार की राजनीति में कई सवाल खड़े कर दिए हैं। विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव खुलकर ये सवाल उठा रहे हैं कि क्या बिहार की बागडोर अब नीतीश कुमार के हाथ में रह भी गई है या नहीं। 


सरकार की ओर से भले ही अब तक कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है लेकिन सूत्रों के हवाले से जो बातें निकलकर सामने आ रही हैं, वो यह इशारा करती हैं कि बिहार में अब एक नई सियासी व्यवस्था आकार ले चुकी है। जब तक मुख्यमंत्री की हालत छिपी हुई थी, उस वक्त उनके खास सलाहकार और पूर्व मुख्य सचिव दीपक कुमार ही पर्दे के पीछे से सारी कमान संभाले हुए थे। उनके साथ आईएएस अधिकारी कुमार रवि और एस सिद्धार्थ भी सरकार चलाने में सक्रिय भूमिका निभा रहे थे। लेकिन जैसे ही ये मामला खुलकर सामने आने लगा, सरकार ने एक नया सिस्टम खड़ा कर लिया। 


अब बिहार की सत्ता का असली संचालन उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और केंद्रीय मंत्री ललन सिंह के हाथों में नजर आ रहा है। इन दोनों नेताओं ने हाल ही में कई अहम बैठकों में अधिकारियों और मंत्रियों के साथ मिलकर राज्य से जुड़े फैसलों पर चर्चा की। यही वजह है कि अब विपक्ष ने सवाल उठाना शुरू कर दिया है कि क्या बिहार की सरकार नीतीश कुमार नहीं, बल्कि सम्राट चौधरी और ललन सिंह चला रहे हैं। दरअसल इस व्यवस्था के पीछे एनडीए की बड़ी सियासी रणनीति भी छिपी है। 


बिहार में 2025 में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले एनडीए ये संदेश देना चाहता है कि सरकार मजबूत हाथों में है और कामकाज पूरी रफ्तार से चल रहा है। नीतीश कुमार की बिगड़ती सेहत की खबर से जनता में जो संशय पैदा हो सकता था, उसे दूर करने के लिए ये नई व्यवस्था बनाई गई है। सम्राट चौधरी जहां बीजेपी के मजबूत चेहरे के तौर पर सामने हैं, वहीं ललन सिंह जेडीयू के भीतर संगठन और कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। 


इस नई व्यवस्था के जरिए एनडीए लव-कुश समीकरण को भी साधने की कोशिश में है। नीतीश कुमार और सम्राट चौधरी इस समीकरण के प्रमुख चेहरे हैं। इसके साथ ही सवर्ण वोट बैंक को भी मैसेज देने की तैयारी है कि बीजेपी और जेडीयू मिलकर सत्ता में संतुलन बनाए हुए हैं। लेकिन सियासत के गलियारों में चर्चा ये भी है कि बीजेपी चाहती थी कि विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री का चेहरा बदलकर सीधे अपना मुख्यमंत्री बना दे, ताकि नीतीश कुमार की सेहत के सवालों से बचा जा सके। फिलहाल इस दिशा में कुछ होता नजर नहीं आ रहा है। 


ललन सिंह की सक्रियता से जेडीयू कार्यकर्ताओं में ये उम्मीद जागी है कि सीट बंटवारे में पार्टी की भूमिका बीजेपी के बराबर मजबूत रहेगी। अबतक यह माहौल बन रहा था कि बीजेपी बड़े भाई की भूमिका में आ जाएगी, लेकिन नई व्यवस्था ने जेडीयू को फिर से मजबूती का एहसास कराया है। 


बहरहाल, बिहार की राजनीति इस वक्त एक दिलचस्प मोड़ पर खड़ी है। एक तरफ नीतीश कुमार की सेहत को लेकर सियासी सवाल उठ रहे हैं तो दूसरी तरफ एनडीए इस नए फॉर्मूले के जरिए चुनाव से पहले अपने समीकरणों को दुरुस्त करने की कोशिश में जुट गया है। अब देखना होगा कि जनता इस नई व्यवस्था को कितना स्वीकार करती है और आने वाले चुनाव में इस सियासी समीकरण का क्या असर पड़ता है।

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