आसा’ छोड़ अब ‘जन सुराज’ की राह पर आरसीपी सिंह, Prashant Kishor के साथ नई सियासी पारी की तैयारी
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**RCP Singh का सियासी यू-टर्न: 'आसा' से निराशा, अब 'जन सुराज' पर भरोसा?**
बिहार की राजनीति एक बार फिर करवट लेती दिख रही है। पूर्व केंद्रीय मंत्री और कभी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेहद करीबी रहे आरसीपी सिंह एक बार फिर चर्चा में हैं। वजह है उनकी अपनी बनाई हुई पार्टी 'आसा' को छोड़कर प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी में शामिल होने की संभावनाएं। सूत्रों के अनुसार, रविवार यानी 18 मई को पटना में होने वाली जन सुराज की प्रेस कॉन्फ्रेंस में आरसीपी सिंह जन सुराज का दामन थाम सकते हैं। अगर ऐसा होता है तो यह बिहार की सियासत में एक बड़ा घटनाक्रम होगा।
आरसीपी सिंह ने पिछले साल 31 अक्टूबर को 'आसा' यानी 'आप सबकी आवाज़' नाम से अपनी नई राजनीतिक पार्टी की घोषणा की थी। उन्होंने इसे दीपावली के शुभ अवसर पर लॉन्च करते हुए इसे एक नई उम्मीद की शुरुआत बताया था। तब उन्होंने यह विश्वास जताया था कि जनता की समस्याओं को लेकर उनकी पार्टी मजबूती से काम करेगी और जनता को एक नया विकल्प देगी। लेकिन चंद महीनों में ही उन्होंने अपनी पार्टी के भविष्य पर खुद ही प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
सूत्रों की मानें तो प्रशांत किशोर और आरसीपी सिंह के बीच इस मुद्दे पर कई दौर की बातचीत हो चुकी है। यह स्पष्ट संकेत है कि जन सुराज के साथ जुड़ाव सिर्फ गठबंधन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आरसीपी सिंह की 'आसा' पार्टी का विलय भी संभव है। जन सुराज की ओर से रविवार को पटना में बुलाई गई प्रेस कॉन्फ्रेंस में खुद प्रशांत किशोर मौजूद रहेंगे, और संभवतः आरसीपी सिंह भी मंच साझा करेंगे।
आरसीपी सिंह का यह फैसला कई सवाल खड़े करता है। सबसे अहम सवाल यही कि क्या उन्हें अपनी बनाई हुई पार्टी पर विश्वास नहीं रहा? क्या वह जमीनी स्तर पर जनता का समर्थन हासिल नहीं कर पाए? या यह फैसला पूरी तरह से चुनावी रणनीति के तहत लिया गया है, जिसमें वे एक मजबूत राजनीतिक प्लेटफॉर्म की तलाश में थे और जन सुराज को उस विकल्प के रूप में देख रहे हैं?
आरसीपी सिंह का राजनीतिक सफर भी कम दिलचस्प नहीं रहा है। भारतीय प्रशासनिक सेवा से राजनीति में आए आरसीपी सिंह जदयू में नीतीश कुमार के सबसे करीबी माने जाते थे। उन्हें राज्यसभा भेजा गया, केंद्र में मंत्री भी बनाया गया। लेकिन वक्त बदला और रिश्ते बिगड़ते गए। जदयू से अलग होने के बाद उन्होंने अपनी राह खुद चुनी और 'आसा' की नींव रखी। लेकिन अब जब उनकी पार्टी का जनाधार मजबूत नहीं हो पाया, तो उन्होंने जन सुराज में नई संभावनाएं तलाशना शुरू कर दिया।
बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले यह घटनाक्रम काफी महत्वपूर्ण है। जहां एक ओर एनडीए और महागठबंधन अपनी-अपनी रणनीतियों पर काम कर रहे हैं, वहीं जन सुराज जैसे नए विकल्प इस बार की सियासत में अहम भूमिका निभाने की कोशिश कर रहे हैं। आरसीपी सिंह जैसे अनुभवी नेता का जन सुराज से जुड़ना निश्चित रूप से प्रशांत किशोर के लिए एक बड़ा राजनीतिक लाभ साबित हो सकता है।
हालांकि, इस पूरी स्थिति पर आरसीपी सिंह की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। ना ही उनकी पार्टी 'आसा' की तरफ से किसी ने मीडिया से बात की है। अब सबकी नजर रविवार को होने वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस पर टिकी है, जहां तस्वीर पूरी तरह साफ हो सकती है।
बिहार की राजनीति में नेताओं के पाला बदलने की घटनाएं आम हैं, लेकिन जब कोई नेता अपनी ही बनाई पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में शामिल होता है, तो यह सियासी गलियारों में हलचल जरूर मचाता है। अब देखना यह है कि क्या आरसीपी सिंह का यह फैसला उन्हें एक नई राजनीतिक ऊर्जा देगा या यह भी सियासत की उन कहानियों में शामिल हो जाएगा जो उम्मीद से शुरू होकर समझौतों में खत्म होती हैं।
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