PK का मिशन 2025: सिताबदियारा से शुरू हुई 'बिहार बदलाव यात्रा', 243 सीटों पर पहुंचेगा जनसंपर्क
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**PK का मिशन 2025: सिताबदियारा से शुरू हुई 'बिहार बदलाव यात्रा', सभी 243 सीटों पर पहुंचेगा जनसंपर्क अभियान**
2025 के बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। इसी बीच जन सुराज पार्टी के संस्थापक और चुनावी रणनीतिकार के रूप में अपनी खास पहचान बना चुके प्रशांत किशोर ने आज यानी 20 मई से 'बिहार बदलाव यात्रा' की शुरुआत की है। इस यात्रा की शुरुआत सारण जिले के सिताबदियारा से की गई है, जो लोकनायक जयप्रकाश नारायण की जन्मस्थली है। प्रतीकात्मक रूप से यह शुरुआत बेहद अहम मानी जा रही है, क्योंकि पीके इस यात्रा के जरिए न सिर्फ चुनावी तैयारी कर रहे हैं बल्कि व्यवस्था परिवर्तन का नया संकल्प भी लेकर निकले हैं।
प्रशांत किशोर की यह यात्रा अगले 120 दिनों तक चलेगी और राज्य की सभी 243 विधानसभा सीटों तक पहुंचेगी। हर दिन वे 2 से 3 विधानसभा क्षेत्रों में जाएंगे, लोगों से मिलेंगे, जनसभाओं को संबोधित करेंगे और जन सुराज पार्टी का विजन व रोडमैप साझा करेंगे। उनका मकसद है आम लोगों तक अपनी बात को सीधा पहुंचाना और बिहार की जनता से जुड़ना। यह यात्रा 2022 में शुरू हुई जन सुराज पदयात्रा का विस्तार मानी जा रही है, जिसमें पीके ने दो साल तक बिहार के गांव-गांव जाकर जनता से संवाद किया था।
प्रशांत किशोर ने साफ किया है कि उनकी पार्टी सभी सीटों पर अकेले चुनाव लड़ेगी। न तो किसी गठबंधन का हिस्सा बनेंगे और न ही चुनाव के बाद गठबंधन करेंगे। हाल ही में हुए उपचुनावों में पार्टी को करारी हार मिली थी, लेकिन पीके ने इसे नया सबक मानते हुए मजबूती से दोबारा मैदान में उतरने का ऐलान किया है।
इस यात्रा के दौरान वे राज्य सरकार पर भी निशाना साधेंगे। खासतौर पर जातिगत जनगणना, भूमि सर्वे और दलित-महादलित समुदाय के विकास जैसे मुद्दों पर सरकार की कथित नाकामी को उजागर करने का प्रयास करेंगे। पीके का कहना है कि पिछले 35 वर्षों से बिहार में जेपी के अनुयायियों की सरकार रही है, लेकिन इन सरकारों ने सिर्फ वादे किए, बिहार को नहीं बदला। अब वक्त है बदलाव का — और इस बदलाव की शुरुआत उन्होंने जेपी की धरती से की है।
प्रशांत किशोर की यह यात्रा न सिर्फ चुनाव प्रचार का माध्यम है, बल्कि राज्य की राजनीतिक फिजा को त्रिकोणीय बनाने की कोशिश भी है। बिहार में आमतौर पर महागठबंधन और एनडीए के बीच सीधा मुकाबला होता है, लेकिन पीके इस बार तीसरे मोर्चे के रूप में खुद को स्थापित करने में जुटे हैं। उनकी कोशिश है कि जनता को एक वैकल्पिक और मजबूत विकल्प मिले जो केवल जाति और समीकरण की राजनीति से ऊपर उठकर विकास और नीतियों की बात करे।
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो यह यात्रा पीके के लिए एक बड़ा राजनीतिक इम्तिहान है। यदि वे जनता से जुड़ने में कामयाब होते हैं और जमीनी स्तर पर समर्थन हासिल कर पाते हैं, तो वे बिहार की राजनीति में एक नया अध्याय लिख सकते हैं। वहीं, अगर यात्रा महज़ एक प्रचार अभियान बनकर रह जाती है, तो इसका असर आगामी चुनावों में सीमित हो सकता है।
फिलहाल, बिहार की सियासत में ‘बदलाव’ की एक नई आवाज गूंज रही है। प्रशांत किशोर की इस यात्रा पर सबकी निगाहें टिकी हैं। देखना होगा कि यह यात्रा किस दिशा में जाती है और क्या यह वाकई 2025 में बिहार की तस्वीर बदल पाएगी।
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