भारत-पाकिस्तान के बीच बढ़ता तनाव: पड़ोसी देशों की चुप्पी या रणनीति ?

भारत-पाकिस्तान के बीच बढ़ता तनाव: पड़ोसी देशों की चुप्पी या रणनीति ?


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**भारत-पाकिस्तान के बीच बढ़ता तनाव: पड़ोसी देशों की चुप्पी या रणनीति?**

भारत और पाकिस्तान के बीच हाल ही में उपजे तनाव ने न केवल इन दोनों देशों को, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया को चिंता में डाल दिया है। सीमावर्ती इलाकों में गोलीबारी, ड्रोन हमलों के आरोप और जवाबी सैन्य कार्रवाई की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। भारत ने दावा किया है कि वह "ऑपरेशन सिंदूर" के तहत आतंक के अड्डों पर सटीक कार्रवाई कर रहा है, जबकि पाकिस्तान इसका खंडन कर रहा है। इस बीच दोनों देशों के बीच कूटनीतिक बयानबाज़ी तेज़ है, और इस टकराव के बीच एक अहम सवाल उठता है – इस पूरे घटनाक्रम पर भारत के पड़ोसी देशों की क्या प्रतिक्रिया है?

### चुप्पी में छिपा डर?

नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश, भूटान और म्यांमार जैसे दक्षिण एशियाई देश इस तनाव पर चुप हैं। ज़्यादातर देशों ने कोई आधिकारिक बयान तक नहीं दिया है। जानकारों का मानना है कि यह चुप्पी रणनीतिक है। इन देशों की आर्थिक और व्यापारिक निर्भरता भारत पर है, इसलिए वे खुलकर किसी पक्ष में बोलने से बच रहे हैं। खासतौर पर नेपाल और भूटान, जो भारत पर व्यापार और पर्यटन के लिए काफी निर्भर हैं, किसी भी सैन्य या राजनीतिक अस्थिरता से बचना चाहेंगे।


### श्रीलंका और बांग्लादेश की स्थिति


श्रीलंका ने हाल के वर्षों में भारत से कई बार आर्थिक मदद ली है। भारत-श्रीलंका संबंध भले गर्मजोशी से भरे न हों, लेकिन दोनों देशों के बीच व्यापारिक और कूटनीतिक संबंध मज़बूत हैं। ऐसे में श्रीलंका किसी ऐसे विवाद में नहीं पड़ना चाहेगा, जो उसकी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा सकता है।


वहीं बांग्लादेश की राजनीति इस समय संक्रमण काल से गुजर रही है। वहां अंतरिम सरकार बनी है और भारत से संबंधों को लेकर मतभेद भी बढ़ रहे हैं। हालांकि दोनों देशों के बीच निवेश और व्यापार का बड़ा रिश्ता है, इसलिए बांग्लादेश भी खुलकर कोई पक्ष लेने से बच रहा है।


### चीन की दिलचस्प भूमिका


इस पूरे घटनाक्रम में चीन की भूमिका बेहद अहम है। चीन, पाकिस्तान का पुराना सहयोगी और निवेशक है। CPEC (चाइना-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर) और बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स पाकिस्तान में चल रहे हैं। ऐसे में चीन पाकिस्तान को अस्थिर नहीं देखना चाहेगा। चीन ने भारत के सैन्य ऑपरेशन को ‘अफ़सोसजनक’ तो बताया, लेकिन यह भी कहा कि वह आतंकवाद के हर रूप का विरोध करता है। यह दोहरी भाषा चीन की चालाक कूटनीति का संकेत देती है – जहां वह भारत को नाराज़ नहीं करना चाहता और पाकिस्तान के साथ खड़ा भी दिखना चाहता है।


### कूटनीति बनाम सैन्य जवाब


भारत इस बार सिर्फ सैन्य जवाब तक सीमित नहीं है। उसने वैश्विक मंच पर यह छवि बनाई है कि वह आतंक के खिलाफ लड़ाई लड़ रहा है, न कि किसी देश के खिलाफ। भारत का फोकस आतंकवाद को जड़ से खत्म करने पर है और यही कारण है कि उसे कई अंतरराष्ट्रीय ताकतों का समर्थन भी मिला है। विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों ने इस सैन्य अभियान का समर्थन किया है, जो यह दर्शाता है कि इस बार देश एकजुट है।


### निष्कर्ष


भारत-पाकिस्तान तनाव एक बार फिर साबित करता है कि दक्षिण एशिया की स्थिरता कितनी नाजुक है। जब भी ये दोनों देश टकराते हैं, पूरा क्षेत्र संकट में आ जाता है। पड़ोसी देशों की चुप्पी शायद रणनीतिक हो, लेकिन अगर यही तनाव युद्ध में बदल गया, तो सबसे ज़्यादा नुकसान इन्हीं देशों को होगा। ज़रूरत इस बात की है कि क्षेत्रीय सहयोग को प्राथमिकता दी जाए, और आतंक के खिलाफ एकजुट होकर कदम उठाए जाएं।


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