जाति जनगणना पर शिवसेना-यूबीटी का रुख: प्रियंका चतुर्वेदी और आनंद दुबे के बयान से उठे सवाल

जाति जनगणना पर शिवसेना-यूबीटी का रुख: प्रियंका चतुर्वेदी और आनंद दुबे के बयान से उठे सवाल


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**जाति जनगणना पर शिवसेना-यूबीटी का रुख: प्रियंका चतुर्वेदी और आनंद दुबे के बयान से उठे सवाल**

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हाल ही में हुई केंद्रीय कैबिनेट बैठक में जाति जनगणना को मंजूरी दे दी गई है। इस फैसले के बाद देश की राजनीति में हलचल मच गई है और विभिन्न दलों की प्रतिक्रियाएं लगातार सामने आ रही हैं। इसी कड़ी में अब उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) की प्रतिक्रिया ने भी खासा ध्यान खींचा है। पार्टी की राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी और प्रवक्ता आनंद दुबे ने जाति जनगणना पर अपने विचार सामने रखे हैं, लेकिन दोनों के बयानों में अंतर दिखाई देता है।

**प्रियंका चतुर्वेदी: "हम भारतीय कब बनेंगे?"**

प्रियंका चतुर्वेदी ने जाति जनगणना पर सवाल उठाते हुए कहा, "पहले आपकी धर्म पहचान, फिर आपकी आर्थिक स्थिति पहचान, अब आती है आपकी जाति पहचान। हम पहले भारतीय कब बनेंगे?" उन्होंने इस सवाल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जोड़ते हुए कहा कि 11 साल पहले जिन लोगों ने 'नए भारत' का सपना दिखाया था, अब वही पहचान की राजनीति को और गहरा कर रहे हैं। चतुर्वेदी का यह बयान जातिगत आधार पर समाज को और अधिक बांटने की आशंका जाहिर करता है।


**आनंद दुबे का समर्थन, लेकिन सवाल भी**


दूसरी ओर, शिवसेना-यूबीटी के प्रवक्ता आनंद दुबे ने जाति जनगणना के फैसले का स्वागत किया। उन्होंने कहा, "कुछ जातियां ऐसी हैं जो आज भी मुख्यधारा से पीछे हैं। विपक्ष लंबे समय से इसकी मांग कर रहा था, और अब जब केंद्र सरकार ने इसे स्वीकार किया है, तो यह स्वागत योग्य है।" हालांकि, उन्होंने यह भी सवाल किया कि क्या यह फैसला सिर्फ आगामी बिहार चुनावों को ध्यान में रखते हुए लिया गया है? आनंद दुबे ने मांग की कि सरकार इस प्रक्रिया को जल्द से जल्द शुरू करे ताकि समाज के हर वर्ग को न्याय मिल सके।


**पार्टी में मतभेद या रणनीतिक संतुलन?**


प्रियंका चतुर्वेदी और आनंद दुबे के बयानों के बीच फर्क साफ झलकता है। एक ओर जहां प्रियंका जाति पहचान पर सवाल उठाती हैं, वहीं आनंद दुबे इसे सामाजिक सुधार की दिशा में जरूरी कदम मानते हैं। यह फर्क दर्शाता है कि शिवसेना-यूबीटी पार्टी के भीतर भी जाति जनगणना को लेकर कोई एकराय नहीं है या फिर यह एक रणनीतिक संतुलन है, जिससे पार्टी सामाजिक न्याय के पक्ष में भी दिखे और राष्ट्रवाद की विचारधारा से भी न हटे।

**सरकार का पक्ष और कांग्रेस पर हमला**

जाति जनगणना को लेकर सरकार का पक्ष रखते हुए केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कांग्रेस पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि 1947 के बाद से अब तक जाति जनगणना नहीं हुई और कांग्रेस सरकारों ने सिर्फ जातिगत सर्वे ही कराए। उन्होंने यह भी बताया कि 2010 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस मुद्दे को कैबिनेट में विचार के लिए भेजने का वादा किया था, लेकिन इसके बावजूद कांग्रेस ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया। वैष्णव ने यह भी कहा कि विपक्षी दल जाति जनगणना को केवल अपने राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करते हैं।

**निष्कर्ष: आंकड़े जोड़ेंगे या बांटेंगे?**

जाति जनगणना अब केवल आंकड़े जुटाने की कवायद नहीं रही, बल्कि यह देश की राजनीति का एक अहम मोर्चा बन गई है। एक तरफ सामाजिक न्याय के नाम पर इसकी मांग की जा रही है, वहीं दूसरी ओर पहचान की राजनीति और सामाजिक बंटवारे की आशंका भी जताई जा रही है। शिवसेना-यूबीटी के भीतर ही इस पर दो राय सामने आना इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में यह मुद्दा और भी गर्माएगा।

अब देखना होगा कि उद्धव ठाकरे खुद इस मुद्दे पर क्या स्पष्ट रुख अपनाते हैं और पार्टी की अंतिम लाइन क्या होती है। लेकिन यह तो तय है कि जाति जनगणना आने वाले चुनावी मौसम में एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनने जा रहा है।

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