राजनीति में लिप्त शिक्षकों पर अब कार्रवाई तय: एस सिद्धार्थ ने जारी किया केके पाठक जैसा सख्त फरमान!

राजनीति में लिप्त शिक्षकों पर अब कार्रवाई तय: एस सिद्धार्थ ने जारी किया केके पाठक जैसा सख्त फरमान!


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**राजनीति में लिप्त शिक्षकों पर अब कार्रवाई तय: एस सिद्धार्थ ने जारी किया केके पाठक जैसा सख्त फरमान**  

*लेखिका: राधा राणा*

बिहार में शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर सख्त निगरानी के दायरे में है। राज्य के नए अपर मुख्य सचिव (ACS) एस सिद्धार्थ ने स्पष्ट संकेत दे दिए हैं कि अब स्कूल से गैरहाजिर रहने वाले और स्थानीय राजनीति में लिप्त शिक्षकों पर कोई नरमी नहीं बरती जाएगी। उन्होंने एक आदेश जारी कर सभी जिला शिक्षा पदाधिकारियों (DEO) को निर्देश दिया है कि ऐसे शिक्षकों की पहचान कर उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाए और उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जाए।

यह आदेश एक सामान्य पत्र की तरह नहीं है, बल्कि यह बिहार की शिक्षा व्यवस्था में अनुशासन और जवाबदेही की नई शुरुआत का संकेत है। एस सिद्धार्थ का यह कड़ा रुख पूर्व ACS केके पाठक की सख्त कार्यशैली की याद दिलाता है, जिन्होंने शिक्षकों की उपस्थिति और कार्य व्यवहार को लेकर कई अहम सुधारात्मक कदम उठाए थे। अब सिद्धार्थ भी उन्हीं नीतियों को आगे बढ़ा रहे हैं।


दरअसल, शिक्षा विभाग को लगातार ऐसी शिकायतें मिल रही थीं कि कुछ शिक्षक स्कूल में सिर्फ उपस्थिति दर्ज करवा कर गायब हो जाते हैं। कुछ मामलों में तो यह भी सामने आया कि शिक्षक स्थानीय स्तर पर राजनीति में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। यह न सिर्फ शिक्षा व्यवस्था के साथ विश्वासघात है, बल्कि छात्रों के भविष्य के साथ भी खिलवाड़ है।


28 अप्रैल को विभाग ने कुछ स्कूलों का गुप्त निरीक्षण कराया, जिसमें कई शिक्षक अनुपस्थित पाए गए। इसके बाद एस सिद्धार्थ ने सख्त लहजे में आदेश जारी करते हुए कहा कि अगर कोई शिक्षक हाजिरी लगाकर गायब पाया गया या राजनीतिक गतिविधियों में शामिल मिला, तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी। विभाग ने इसे ‘शिक्षा विभाग के साथ धोखाधड़ी’ करार दिया है।


यह भी स्पष्ट किया गया है कि शिक्षक, जो एक सरकारी सेवक की भूमिका में होता है, उसे संविधान प्रदत्त राजनीतिक अधिकारों के बावजूद सेवा नियमों का पालन करना होता है। शिक्षक का मूल कर्तव्य बच्चों को शिक्षित करना है, न कि चुनावी अभियानों या स्थानीय सत्ता संघर्षों में भाग लेना।


शिक्षा विभाग का यह कदम न केवल लापरवाह शिक्षकों के लिए एक सख्त संदेश है, बल्कि एक उम्मीद भी है उन अभिभावकों और छात्रों के लिए, जो सरकारी स्कूलों से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की अपेक्षा रखते हैं। अगर इस आदेश को धरातल पर सही तरीके से लागू किया गया, तो बिहार की शिक्षा प्रणाली में निश्चित रूप से सुधार की उम्मीद की जा सकती है।


एस सिद्धार्थ के नेतृत्व में बिहार शिक्षा विभाग अब पहले से अधिक सक्रिय और उत्तरदायी दिखाई दे रहा है। यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले समय में यह सख्ती कितनी प्रभावी होती है और शिक्षा की गुणवत्ता पर इसका कितना सकारात्मक असर पड़ता है।


**निष्कर्षतः**, यह कहा जा सकता है कि अब बिहार में शिक्षक की भूमिका केवल किताबों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि उसकी जवाबदेही और प्रतिबद्धता पर भी नज़र रखी जाएगी। यह कदम शिक्षा को राजनीति के प्रभाव से दूर रखने और एक मजबूत शैक्षणिक आधार तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

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